20+ Best meraj faizabadi shayari

Friends, today we have brought Meraj Faizabadi Shayari in front of you. Meraj Faizabadi was such a poet whose poetry used to go straight into the hearts and minds of the people. Meraj Faizabadi’s real name was “Merajul Haq” born in a small village “Kola-Sharif” in Faizabad. His father’s name was “Sirajul Haq”. But who knew that this small child would one day make Faizabad and India proud by becoming Meraj Faizabadi in the whole world.

Top Meraj faizabadi shayari

Meraj faizabadi shayari
बढ़ गया था प्यास का अहसास दरिया देखकर,
हम पलट आए मगर पानी को प्यासा देखकर,
खुदखुशी लिखी थी एक बेवा के चेहरे पर मगर,
फिर वो जिन्दा हो गयी बच्चे बिलखता देखकर।
पढ़ाओं न रिश्तों की कोई किताब मुझे,
पढ़ी है बाप के चेहरे की झुर्रियां मैंने।
हमारी नफरतों की आग में सब कुछ न जल जाए,
कि इस बस्ती में हम दोनों को आइन्दा भी रहना है,
मना ले कुछ देर जश्न दुश्मन की तबाही का,
फिर उसके बाद सारी उम्र शर्मिंदा भी रहना है।
सुना है बंद कर लीं उसने आँखें,
कई रातों से वो सोया नहीं था।
मुहब्बत को मेरी पहचान कर दे,
मेरे मौला मुझे इंसान कर दे,
मुहब्बत, प्यार, रिश्ते, भाईचारा,
हमारे दिल को हिंदुस्तान कर दे।

Meraj faizabadi shayari

Meraj faizabadi shayari
मुहब्बत को मेरी पहचान कर दे,
मेरे मौला मुझे इंसान कर दे,
मुहब्बत, प्यार, रिश्ते, भाईचारा,
हमारे दिल को हिंदुस्तान कर दे।
आँख और ख्वाब में एक रात की दूरी रखना,
ऐ मुसव्विर मेरी तस्वीर अधूरी रखना,
अब के तख़लीक़ जो करना कोई रिश्तों का निज़ाम,
दुश्मनी के भी कुछ आदाब ज़रूरी रखना।
एक टूटी हुई जंजीर की फ़रियाद है हम,
और दुनिया समझती है की आजाद है हम,
हमको इस दौर की तारीख ने दिया क्या ‘मेराज’,
कल भी बर्बाद थे आज भी बर्बाद है हम।
ऐ यकीनों के ख़ुदा शहरे गुमां किसका है,
नूर तेरा है चरागों में धुआं किसका है।
मेरे अल्फाज का यह शीश महल सच हो जाए,
मैं तेरा जिक्र करूं मेरी गजल सच हो जाए,
ज़िन्दगी भर तो कोई झूठ जीया है मैंने,
तू जो आ जाये तो यह आख़िरी पल सच हो जाए।

Meraj faizabadi shayari

Meraj faizabadi shayari
झील आँखों को न होंठों को कमल कहते हैं,
हम तो जख्मों की नुमाइश को ग़ज़ल कहते हैं।
ज़िंदगी दी है तो जीने का हुनर भी देना 
पाँव बख़्शें हैं तो तौफ़ीक़-ए-सफ़र भी देना  गुफ़्तुगू तूने सिखाई है कि मैं गूँगा था 
अब मैं बोलूँगा तो बातों में असर भी देना 
मैं तो इस ख़ाना-बदोशी में भी ख़ुश हूँ लेकिन 
अगली नस्लें तो न भटकें उन्हें घर भी देना  ज़ुल्म और सब्र का ये खेल मुकम्मल हो जाए 
उस को ख़ंजर जो दिया है मुझे सर भी देना 
हम गजल में तिरा चर्चा नहीं होने देते
तेरी यादों को भी रुस्वा नहीं होने देते। कुछ हम खुद भी नहीं चाहते शोहरत अपनी
और कुछ लोग भी ऐसा नहीं होने देते। मुझ को थकने नहीं देता ये जरूरत का पहाड़
मेरे बच्चे मुझे बूढ़ा नहीं होने देते।।
बेखुदी में रेत के कितने समंदर पी गया
प्यास भी क्या शय है, मैं घबरा के पत्थर पी गया।
मयकदे में किसने कितनी पी खुदा जाने मगर
मयकदा तो मेरी बस्ती के कई घर पी गया।।

Read Also:- 200+ Best Iqbal Shayari In Hindi, English & Urdu

Similar Posts