zubair ali tabish shayari

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Zubair Ali Tabish Shayari

चाहत में मर जाने वाली लड़की हो,
तुम सचमुच अफ़साने वाली लड़की हो,
आखिरी बैंच पे बैठने वाला लड़का मैं,
जाओ तुम अव्वल आने वाली लड़की हो।
चले जाओ भी अब जी लेंगे पर,
सच कहो मजबूरी है क्या,
मुझे ये कहानी कुछ और लिखनी थी,
तुम्हारे हिसाब से पूरी है क्या।
बैठे-बैठे इक दम से चौंकाती है,
याद तेरी कब दस्तक दे कर आती है,
तितली के जैसी है मेरी हर ख़्वाहिश,
हाथ लगाने से पहले उड़ जाती है।
कोई काँटा कोई पत्थर नहीं है,
तो फिर तू सीधे रस्ते पर नहीं है,
मैं इस दुनिया के अंदर रह रहा हूँ,
मग़र दुनिया मेरे अंदर नहीं है।
इसी ख़ुशी ने मेरा दम निकाल रखा है,
की उसने अब भी मेरा गम संभाल रखा है।
हमने पर्चे आंसुओं से भर दिए,
और तुमने इतने कम नंबर दिए,
ऊंचे नीचे घर थे बस्ती में बहुत,
जलजले ने सब बराबर कर दिए।
हमारा दिल तो हमेशा से एक जगह पर है,
तुम्हारा दर्द ही रास्ता भटक गया होगा,
बिछड़ कर भी हूँ ज़िंदा रहने वाला,
तू होता कौन है ये कहने वाला।
इश्क़ में ये दावा तो नहीं है कि मैं ही अव्वल आऊँगा,
लेकिन इतना कह सकता हूँ अच्छे नंबर लाऊँगा।
मैं कोई राह हूँ तुम राह देखने वाले,
कि मुंतज़िर तो मरा पर न इंतिज़ार मरा,
तुम्हारी मौत मेरी ज़िंदगी से बेहतर है,
तुम एक बार मरे मैं तो बार बार मरा।

Zubair Ali Tabish Shayari

Zubair Ali Tabish Shayari
कोरे कागज़ पर रो रहे हो तुम,
मैं तो समझा पढ़े लिखे हो तुम,
क्या कहा मुझसे दूर जाना है,
इसका मतलब है जा चुके हो तुम।
तुम्हारा सिर्फ़ हवाओं पे शक गया होगा,
चराग़ ख़ुद भी तो जल जल के थक गया होगा।
मैं जब भी छूता हूँ अपने बदन की मिट्टी को,
तो लम्स फिर उसी ठंडे बदन का होता है,
लिबास रोज़ बदलता हूँ मैं भी सब की तरह,
मगर ख़याल तुम्हारे कफ़न का होता है।
तुम्हारी शम-ए-तमन्ना बस एक रात बुझी,
चराग़ मेरी तवक़्क़ो के रोज़ बुझते हैं,
मैं साँस लूँ भी तो कैसे कि मेरी साँसों में,
तुम्हारी डूबती साँसों के तीर चुभते हैं।
जहाँ पंखा चल रहा है वहीं रस्सी भी पड़ी है,
मुझे फिर खयाल आया, अभी ज़िन्दगी पड़ी है।
मैं बोझ काँधों पे ऐसे उठा के चलता हूँ,
तुम्हारा जैसे जनाज़ा उठा के चलता था,
यहाँ पे मेरी परेशानी सिर्फ़ मेरी है,
वहाँ कोई न कोई कांधा तो बदलता था।
जरा ठहरो की शब फीकी बहुत है,
तुम्हें घर जाने की जल्दी बहुत है,
जरा नजदीक आकर बैठ जाओ,
तुम्हारे शहर में सर्दी बहुत है।
हज़ारों क़र्ज़ थे मुझ पर तुम्हारी उल्फ़त के,
मुझे वो क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा तो देते,
तुम्हारा ख़ून मेरे जिस्म में मचलता रहा,
ज़रा सा क़तरा बहाने का मौक़ा तो देते।
हमने पर्चे आंसुओं से भर दिए
और तुमने इतने कम नंबर दिए
ऊंचे नीचे घर थे बस्ती में बहुत
जलजले ने सब बराबर कर दिए
ज़िक्र हर-सू बिखर गया उसका
कोई दीवाना मर गया उसका

Best Zubair Ali Tabish Shayari

Best Zubair Ali Tabish Shayari
उसने जी भर के मुझको चाहा था
और फिर जी ही भर गया उसका
अपने बच्चों से बहुत डरता हूँ मैं
बिल्कुल अपने बाप के जैसा हूँ मैं
प्यार दो बार थोड़ी होता है
हो तो फिर प्यार थोड़ी होता है
यही बेहतर है तुम उसे रोको
मुझसे इनकार थोड़ी होता है
वो किसी के साथ ख़ुश था कितने दुख की बात थी
अब मेरे पहलू में आ कर रो रहा है ख़ुश हूँ मैं
सुहागन भी बता देगी मगर तुम पूछो विधवा से
ये मंगलसूत्र ज़ेवर के अलावा भी बहुत कुछ है
ये क्या इक मक़बरे को आख़री हद मान बैठे हो
मोहब्बत संग-ए-मरमर के अलावा भी बहुत कुछ है
बंसी सब सुर त्यागे है, एक ही सुर में बाजे है
हाल न पूछो मोहन का, सब कुछ राधे राधे है
अब न निकलूँगा तेरी बाँहों से, अपनी हद में रहा करूँगा मैं
मेरे सीने में है मेरा उस्ताद इसने जो भी कहा करूँगा मैं

Top Zubair Ali Tabish Shayari

Top Zubair Ali Tabish Shayari
मैं रस्मन कह रहा हूँ ''फिर मिलेंगे''
ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ
अदाकार के कुछ भी बस का नहीं है
मोहब्बत है ये कोई ड्रामा नहीं है
जिसे तेरी आँखें बताती हैं रस्ता
वो राही कहीं भी पहुँचता नहीं है
हमने पर्चे आंसुओं से भर दिए
और तुमने इतने कम नंबर दिए
ऊंचे नीचे घर थे बस्ती में बहुत
जलजले ने सब बराबर कर दिए
कोई काँटा कोई पत्थर नही है
तो फिर तू सीधे रस्ते पर नही है
मैं इस दुनिया के अंदर रह रहा हूँ
मग़र दुनिया मेरे अंदर नही है
बैठे-बैठे इक दम से चौंकाती है
याद तिरी कब दस्तक दे कर आती है
तितली के जैसी है मेरी हर ख़्वाहिश
हाथ लगाने से पहले उड़ जाती है

zubair ali tabish shayari in hindi

zubair ali tabish shayari in hindi
चले जाओ भी अब जी लेंगे पर
सच कहो मजबूरी है क्या
मुझे ये कहानी कुछ और लिखनी थी
तुम्हारे हिसाब से पूरी है क्या
चाहत में मर जाने वाली लड़की हो
तुम सचमुच अफ़साने वाली लड़की हो
आखिरी बैंच पे बैठने वाला लड़का मैं
जाओ तुम अव्वल आने वाली लड़की हो
जरा ठहरो की शब फीकी बहुत है
तुम्हें घर जाने की जल्दी बहुत है
जरा नजदीक आकर बैठ जाओ
तुम्हारे शहर में सर्दी बहुत है
जाते-जाते ये कहा उस ने चलो आता हूँ
अब यही देखना है जाता है या आता है
तुझ को वैसे तो ज़माने के हुनर आते हैं
प्यार आता है कभी तुझ को बता आता है
आज तो दिल के दर्द पर हँस कर
दर्द का दिल दुखा दिया मैं ने
अपने बच्चों से बहुत डरता हूँ मैं
बिल्कुल अपने बाप के जैसा हूँ मैं

zubair ali tabish shayari status

zubair ali tabish shayari status
अब उस का वस्ल महँगा चल रहा है
तो बस यादों पे ख़र्चा चल रहा है
मोहब्बत दो-क़दम पर थक गई थी
मगर ये हिज्र कितना चल रहा है
अब उसकी शादी का क़िस्सा न छेड़ो
बस इतना कह दो कैसी लग रही थी
अब तलक उस को ध्यान हो मेरा
क्या पता ये गुमान हो मेरा
उसने खिड़की से चाँद देखा था
मैंने खिड़की में चाँद देखा हैं
आइना कब बनाओगे मुझ को
मुझ से किस दिन मिलाओगे मुझ को
इस ज़माने को ज़माने की अदा आती है
और एक हम है हमे सिर्फ वफ़ा आती है
इस दर का हो या उस दर का हर पत्थर पत्थर है लेकिन
कुछ ने मेरा सर फोड़ा हैं कुछ पर मैं ने सर फोड़ा है
आख़री हिचकी लेनी है अब आ जाओ
बा’द में तुम को कौन बुलाने वाला है

zubair ali tabish shayari

zubair ali tabish shayari
कोरे कागज़ पर रो रहे हो तुम
मैं तो समझा पढ़े लिखे हो तुम
क्या कहा मुझसे दूर जाना है
इसका मतलब है जा चुके हो तुम
इश्क़ में ये दावा तो नईं है मैं ही अव्वल आऊँगा
लेकिन इतना कह सकता हूँ अच्छे नंबर लाऊँगा
इसी ख़ुशी ने मेरा दम निकाल रखा है
की उसने अब भी मेरा गम संभाल रखा है
उनके गेसू खुलें तो यार बने बात मेरी
इक रबर बैंड ने जकड़ी हुई है रात मेरी
उस के ख़त रात भर यूँ पढ़ता हूँ
जैसे कल इम्तिहान हो मेरा

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